शनिवार, 18 जून 2011

सिक्स मिस्टेक्स ऑफ़ मेन काईंड-2

आईये अगली दो मिस्टेक्स कौन सी हैं, नज़र डालें !
३.अपने से यदि कोई बात अथवा कार्य नहीं बन सका, अर्थात वो कार्य किसी और से भी हो ही नहीं सकता ऐसा जड़ दुराग्रह।
मनुष्य 'पर्सनल परसेप्शन' के आधार पर 'जनरल डिसीजन' लेता रहता है। जगत में एक सिद्ध वैज्ञानिक सत्य है: उत्क्रांति। इवोल्यूशन। गुजरे हुए कल में कुछ नहीं हुआ, इसलिए आने वाले कल में भी वो नहीं हो सकता ऐसा अंदाजा लगाएँगे तो गए काम से! सौ बरस पहले हवाई जहाज में उड़ने की बात तुक्का लगती थी, आज चाँद पे रहने की बात काल्पनिक लग सकती है।
जीना है तो आशावादी बनना ही पड़ेगा। सादी बोल पॉइंट पेन भी हज़ार वर्षों पहले नहीं थी। इसके लिए पहले किसी घटना में निष्फलता मिली, तो हमेशा ही ऐसा होगा-ऐसा मान लेंगे तो सचमुच ऐसा ही होगा और जवाबदारी अपनी खुद की ही उसमे ज्यादा होगी! बात बदली न जा सके ऐसी हो तो उसकी चिंता नहीं करना चाहिए, उसे स्वीकार करना चाहिए। इतिहास के कीर्तिमान भविष्य में तोड़े जा सके इसलिए ही बनते हैं और वो कोई और तोड़ेगा उसकी प्रतीक्षा करने के बदले, हम नए कीर्तिमान स्थापित कर सके ऐसे प्रयत्न करते रहना चाहिए। चेलेंज बड़ा तो सक्सेस बड़ी। रिस्क ज्यादा तो रिटर्न ज्यादा!
इन शोर्ट, भूतकाल में अन्य के अनुभवों को ही आखरी मानने के बदले यदि दम हो तो (तो और तो ही) ताकत से भविष्य बदलने के लिए वर्त्तमान में टूट पड़ना चाहिए।
४.फालतू बातो का मोह छोड़ने की अशक्ति।
सिसेरो के शब्दों में गर कहें तो 'त्रिविअल प्रेफरंसिस' का इनकार न कर सकने की कमजोरी। सदियों से लोगों को नए नए 'एडिक्शन' बर्बाद करते आ रहे हैं। किसी शौक का जूनून (पेशन) होना और उसका मोह (ओबसेशन) होना- दोनों ही बिलकुल अलग अलग बाते हैं। ऐ आर रहमान कई दिनों तक संगीत ही सुनते रहे। ये उनके लिए क्रिएटिविटी है। हम दूसरा कुछ करने के बदले यदि उनके गीतों को ही सुनते रहे तो यह फालतू टाइमपास है। कितने रजवाड़े ऐसे शिकार, मुजरे, घोडदौड या शतरंज-चोपट जैसी राजाओं के लिए फालतू बातो में सतत ध्यान देने के कारन ही रोड पे आ गए, इसका गवाह इतिहास है।
समय बदलने से एडिक्शन के प्रकार भी बदलते हैं, पर इनमे धूत रह कर बर्बादी को खुद ही बुलाने वाले मुर्ख बदलते नहीं हैं।

शेष दो मिस्टेक्स अगले ब्लॉग में ...!




रविवार, 12 जून 2011

"सिक्स मिस्टेक्स ऑफ़ मेनकाईंड"

सदियों से, सेंचुरी आफ्टर सेंचुरी मनुष्य रह रह कर छह भूलें करता आ रहा है!
ई स पूर्व १०६ में जन्मे जिनीअस फिलोसोफर सिसेरो का कथन है! उनके तेजाबी विचार लोगों की आँखों में इतने चुभते थे कि उन्हें ई स पूर्व ४३ में फांसी पर चढ़ा दिया गया। सिसेरो ने जो 'सिक्स मिस्टेक्स ऑफ़ मेनकाईंड की सूचि बनाई है, वह आज इक्कीसवी सदी में भी आउटडेटेड नहीं हुई। इतना वह बेस्ट है, परफेक्ट है! मनुष्य को हमेशा याद रखकर टालने जैसी ये कौन सी भूलें हैं? आइये नज़र डाले पहली दो मिस्टेक्स पर।
१.अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए दूसरों को कुचलकर ही आगे बढ़ा जा सकता है ये भ्रम।
मतलब, लकीर लम्बी खींचने के लिए चाक ढुडने के बदले लकीर मिटाने के लिए डस्टर लेकर घुमने वाले 'इर्शालू' आज ही हैं, ऐसा नहीं है। शताब्दीयों पहले भी थे। शिशुपाल हमेशा से ऐसा मानते आए हैं कि कृष्ण से खुद को महान साबित करने के लिए कृष्ण को गाली देना चाहिए। परन्तु कृष्ण अपने कर्तव्यों से कृष्ण बने हैं। कंस या जरासंघ को गलियां देकर नहीं। इसलिए, दुनिया में लोग जेनुइन मेंहनत करने के बदले दूसरों कि टांग खींचने में ही लगे रहते हैं। दूसरों के लिए 'बिटर'(कड़वा) होने से पहले खुद को 'बेटर'(उत्तम) बनाने के लिए अपने समय और शक्ति का सदुपयोग करना चाहिए। परन्तु लोग ऐसा इसलिए नहीं कर सकते क्यूंकि उन्हें लगता है कि सिर्फ नोलेज या स्किल प्राप्त कर के आगे नहीं बढ़ा जा सकता, इसके लिए दूसरों को हराने के लिए दूसरों को परेशान करना ही पड़ता है। यह एक परंपरागत भूल है।
किसी को पछाड़कर ही जीता जा सकता है ऐसी स्पर्धात्मक वृत्ति बचपन से ही अपने नम्बर गेम वाली परीक्षा पद्धति दिमाग में घुसा दी जाती है। यदि किसी को पछाड़ना ही है तो अपनी खामियों और अकार्यकुशलता को को पछाड़ा जा सकता है। जिंदगी कार्पोरेट मीटिंग का ग्राफ नहीं है। इसमें सीढियाँ ही नहीं बल्कि आदि टेडी कड़ियाँ भी हैं।
२.जिन विषयों को सुधारा अथवा बदला नहीं जा सकता, सतत उन्ही कि चिंता करने कि वृत्ति।
मनुष्य कि यह दूसरी आदिम भूल है। इक्कीसवी सदी में इम्प्रेशन से भी बढ़ते डिप्रेशन का यह मूल कारण है। ऐसा नहीं के मनुष्य फिकर प्रूफ फकीर ही बन जाए , कि जो घटनाएँ बने वह लाचार शरणागति के भाव से स्वीकार करता ही रहे। जगत में खुद कुदरत भी नियमो से बंधी हुई है, वहां उसके तुच्छ सजीव ऐसे मनुष्य की क्या तुलना? मनुष्य को आत्मविश्वास से छालोछल होकर लोहे का कलेजा रखना चाहिए।
तात्पर्य यह है कि जो कार्य पहुँच से बहार है, यह समझ कर उसमे अपनी 'अ-क्षमता' स्वाभाविक रूप से मान लेना और जिस कार्य में प्रयत्न करने से कुछ हासिल हो सकता है, उसे परख कर उसमे प्रचंड पराक्रम बताने का साहस प्रत्येक मनुष्य में होना चाहिए। आधुनिक स्पर्धात्मक जीवन कि गरबड़ क्या है? ये ही कि लोग निष्फलता अथवा पराजय स्वाभाविक रूप से स्वीकार नहीं कर सकते।
ऐसा नहीं हई कि जीवन में जो हो रहा है उसे होने दो। जो घटना बनती है, उसके आघात के बाद शांत मन से विचार कर लो-उसमे हम सुधार अथवा परिवर्तन के रूप में कुछ कर सकते हैं क्या ? यदि नहीं , तो उसका स्वीकार ही करना पड़ेगा। रो कर या हस कर करो। तू बी हैप्पी, लर्न तू 'एक्सपेक्त' एंड 'एक्सेप्ट' फेल्युअर विथ स्माईल। मोबाइल चोरी हो गया? तो हो गया। रोज़ रोना रोने से वापस तो नहीं आने वाला। नया मोबाइल कैसे आएगा ये सोचना शुरू कीजिये। शिक्षण पद्धति अड़ियल है? तो एक रात में हम नहीं बदल सकते। हम कैसे बेहतर बने उसके लिए श्रम करो।

शेष ४ मिस्टेक्स अगले ब्लॉग में.....